(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

Aadiparv (Mahabharat) - आदिपर्व (महाभारत)


॥ श्रीः ॥
1.89. अध्यायः 089
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Topics
शकुन्तलोपाख्यानारम्भः॥ 1 ॥
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Text

जनमेजय उवाच। 1-89-0x(567)(3864)
भगवन्विस्तरेणेह भरतस्य महात्मनः।
जन्म कर्म च सुश्रूषोस्तन्मे शंसितुमर्हसि॥ 1-89-1(3865)
वैशम्पायन उवाच। 1-89-2x(568)
पौरवाणां वंशकरो दुष्यन्तो नाम वीर्यवान्।
पृथिव्याश्चतुरन्ताया गोप्ता भरतसत्तम॥ 1-89-2(3866)
चतुर्भागं भुवः कृत्स्नं यो भुङ्क्ते मनुजेश्वरः।
समुद्रावरणांश्चापि देशान्स समितिंजयः॥ 1-89-3(3867)
आम्लेच्छावधिकान्सर्वान्स भुङ्क्ते रिपुमर्दनः।
रत्नाकरसमुद्रान्तांश्चातुर्वर्ण्यजनावृतान्॥ 1-89-4(3868)
न वर्णसङ्करकरो न कृष्याकरकृज्जनः।
न पापकृत्कश्चिदासीत्तस्मिन्राजनि शासति॥ 1-89-5(3869)
धर्मे रतिं सेवमाना धर्मार्थावभिपेदिरे।
तदा नरा नरव्याघ्र तस्मिञ्जनपदेश्वरे॥ 1-89-6(3870)
नासीच्चोरभयं तात न क्षुधाभयमण्वपि।
नासीद्व्याधिभयं चापि तस्मिञ्जनपदेश्वरे॥ 1-89-7(3871)
स्वधर्मै रेमिरे वर्णा दैवे कर्मणि निःस्पृहाः।
तमाश्रित्य महीपालमासंश्चैवाकुतोभयाः॥ 1-89-8(3872)
कालवर्षी च पर्जन्यः सस्यानि रसवन्ति च।
सर्वरत्नसमृद्धा च मही पशुमती तथा॥ 1-89-9(3873)
स्वकर्मनिरता विप्रा नानृतं तेषु विद्यते।
स चाद्भुतमहावीर्यो वज्रसंहननो युवा॥ 1-89-10(3874)
उद्यम्य मन्दरं दोर्भ्यां वहेत्सवनकाननम्।
चतुष्पथगदायुद्धे सर्वप्रहरणेषु च॥ 1-89-11(3875)
नागपृष्ठेऽश्वपृष्ठे च बभूव परिनिष्ठतः।
बले विष्णुसमश्चासीत्तेजसा भास्करोपमः॥ 1-89-12(3876)
अक्षोभ्यत्वेऽर्णवसमः सहिष्णुत्वे धरासमः।
संमतः स महीपालः प्रसन्नपुरराष्ट्रवान्॥ 1-89-13(3877)
भूयो धर्मपरैर्भावैर्मुदितं जनमादिशत्॥ ॥ 1-89-14(3878)

इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि एकोननवतितमोऽध्यायः॥ 89 ॥

Mahabharata - Adi Parva - Chapter Footnotes
1-89-5 न कृष्याकरकृत् कृषिकृन्न भुवोऽकृष्टपच्यत्वात्। आकरः सुवर्णादिधातूत्पत्तिस्थानं तत्रापि यत्नं न करोति पृथिव्या रत्नैर्धातुभिश्च पूर्णत्वात्॥ 1-89-8 दैवे कर्मणि वृष्ट्याद्यर्थे कारीर्यादिकाम्यकर्मणि॥ 1-89-9 तदेवाह कालेति॥ 1-89-10 वज्रसंहननो दृढदेहः॥ 1-89-11 सवनकाननं वनं जलमुपवनं वा॥ 1-89-14 आदिशत् शशास॥ एकोननवतितमोऽध्यायः॥ 89 ॥


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